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आइना

मेरी अपनी तस्वीरको भी पलट करके दिखाता है 
झूठ कहा किसीने की आइना सब सच बताता है 

मैं जैसा सोचूं मनमें ठीक वैसा ही देख लूँ खुदको 
मेरे भरमके मुताबिक़ ही प्रतिबिंब बदल जाता है 

उसकी एक मुस्कानने गायब कर दीं शिकन सारी 
ज़रा सा मिजाज़ बदलते ही नए रंगमें ढल जाता है 

कभी फुर्सत मिलती है तो उसको सँवरते देखता हूँ 
ठहरता नहीं है कम्बख्त वहीँ, वक़्त निकल जाता है 

दर्पणके सामने ही मेरे पास आ वो भी खड़े हो गये 
देखता हूँ की ये मेरा अक्स भी उन पर मर जाता है  

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए