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मज़हबी सियासत

क्यों ये ज़िद, कैसी ये आफत है, 
बात मज़हब की, हो रही सियासत है 

नमाज़ क्यों मंदिर में, क्यों मस्जिदमे पूजा 
अपनी अपनी जगह भक्ति औ इबादत है 

बुराई को बुरा केहनेसे मत डरो 
इन हलातोंकी ज़िम्मेदार यही आदत है 

भाई भाई के नारोंने बेडा गर्क किया
चीन हो या पाक दोनों बेगैरत है 

मुसलमाँको जो आज़ादी और सुकूँ की तालिब  
हिन्दुकी भी तो अरदास वही इज़्ज़त है 

आग को है आवश्यक डर पानी का 
गुनाहों को रोकती अंजामकी देहशत है 

लंका हो मगध या हस्तिनापुर 
नाश हों पापी तभी हिफाज़त है 

पडोस के गुंडे से दब जाना 
दुःख को न्योता देती ये हरकत है 

तलवार का काम दीयों से नहीं होगा 
बार बार ज़ुल्म सहना भी ज़िल्लत है 

हाथों से ना सही दिल से तो लड़ो 
आत्मरक्षा की कानून में इज़ाज़त है 

जिसके खिलाफ हो उस जैसा मत बनो 
अपनी पहचान बनी रहे यही हसरत है 

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फिर...

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए