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कामयाबी से पेहले

सोच की दीवारें ख़यालों के पेहरे हैं 
कठिनाइयाँ तसव्वुरमें बेवजह ठेहरे हैं 

ख्वाब देखनेमें गँवा दिए जो मौके 
नज़र आते नहीं ज़ख्म उनके गेहरे हैं 

हालात देखकर मेलजोल बदल लेते हैं
दोस्त रिश्तेदार सब के कई चेहरे हैं 

थोड़ा मतलबी हो जाएँ ये भी जरुरी है 
सादगीको कहाँ कामयाबी के सेहरे हैं 

हुनर ही नहीं ढिंढोरा भी चाहिए 
भीड़ ज़्यादा और फ़ैसलासाज़ बेहरे हैं 

कदम वापस हों तो शिकस्त मत समझना 
पीछे लौटकर ही आगे बढ़ती लेहरे हैं 

शख़्सियत में नमक रक्खो बचाव जितना 
समंदर से क्या कभी निकली नेहरे हैं 

सरलता सफल होने के बाद छजती है 
नाकामीके कोई मुकाम न देहरें हैं 

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फिर...

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए