Skip to main content

कामयाबी से पेहले

सोच की दीवारें ख़यालों के पेहरे हैं 
कठिनाइयाँ तसव्वुरमें बेवजह ठेहरे हैं 

ख्वाब देखनेमें गँवा दिए जो मौके 
नज़र आते नहीं ज़ख्म उनके गेहरे हैं 

हालात देखकर मेलजोल बदल लेते हैं
दोस्त रिश्तेदार सब के कई चेहरे हैं 

थोड़ा मतलबी हो जाएँ ये भी जरुरी है 
सादगीको कहाँ कामयाबी के सेहरे हैं 

हुनर ही नहीं ढिंढोरा भी चाहिए 
भीड़ ज़्यादा और फ़ैसलासाज़ बेहरे हैं 

कदम वापस हों तो शिकस्त मत समझना 
पीछे लौटकर ही आगे बढ़ती लेहरे हैं 

शख़्सियत में नमक रक्खो बचाव जितना 
समंदर से क्या कभी निकली नेहरे हैं 

सरलता सफल होने के बाद छजती है 
नाकामीके कोई मुकाम न देहरें हैं 

Comments