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तबीयत मेरी

तबीयत मेरी भी अब पेहले सी रही कहाँ 
हर वक़्त, हर किसीको मिल जाता नहीं 
नीम के पत्तोंका ज़ायका भा गया शायद 
बाज़ारू मीठे पकवान जल्द खाता नहीं 

शुक्र भगवानका, संभाल लेता है मुश्किलमे 
और ये भी के कभी एहसान जताता नहीं 
दोस्त वो भी हैं, वक़्त के हिसाबसे मिलते हैं 
बात करता तो हूँ पर अब बातमें आता नहीं 

कुछ उम्र का लिहाज़, कुछ खौफ ज़मानेका 
नयी कलियोंको देख पेहलेसा मुस्कुराता नहीं 
नज़र से नज़र का मिलना इत्तेफ़ाक़ ही समझो  
यूँ दिल हर किसीसे अब लगाता नहीं 

एक दीदारको मीलों पैदल चला करते थे कभी 
जबसे शहर छोड़ा है उसने, सैर पर जाता नहीं 
सुबह सुबह उनकी तस्वीर देख लिया करता हूँ 
नमाज़ छोड़ दी है मैंने, अब सजदे भी जाता नहीं

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फिर...

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए