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ઝાન્ઝવા પાછળની દોટ

લાગણીઓનાં દુકાળમાં પીડાતું હૃદય 
બની ગયું છે એકલું, ને 
શોધી રહ્યું છે આજ, કે 
કાશ આવો તમે, ને લઇ જાઓ દૂર ઘણે 
દૂર અંતરિક્ષની પાર, જ્યાં ના રહે કોઈ અવકાશ 
કે કોઈ છીનવી શકે મુજ આકાશ 
ને વિહરીએ આ મુક્ત ગગનમાં પંખી બની 
ભયના હોય કે ના હોય કોઈ લાલચ જ્યાં 
કે જીવતી સંવેદનાઓનું ના હોય કોઈ મરઘટ ત્યાં 
આવો, આવો ને મીત મારા કે પ્રીતના હો ભણકારાં 
ને ઉન્મત્ત બનીને ફરતા સુરજનેય
કરવી પડે આંખોં બંદ, ફેલાવો તમારા પ્રેમનો એવો ચળકાટ
છે ઘણી જે સાલતી તમારી મુજને ખોટ 
પુરી દો, પુરી દો ને આવી વરસો બની વાદળી 
ભીંજવો મુજ અસ્તિત્વને છીપાવો દો તૃષા 
રોકી દો, રોકી દો મારી ઝાન્ઝવા પાછળની દોટ 

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Month end

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एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए