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મૂર્ખની ચાહ

છે કેવો મૂર્ખ જે કરે છે એવી ચાહ 
ઉભો ભેંકાર રણમાં ને માંગે વૃક્ષની છાંહ
માનવતાથી દૂર એવી એક વસાહતમાં
જ્યાંના હિંસક પશુઓ ખપાવે ખુદને માણસમાં 
છે બધા અંધ અને મૂંગા
બેહરા ને લૂલા-લંગડા 
ને ખુદના મનોરંજનને ખાતર
નાખે બીજાને આફતમાં 
હતું ભોળું આ નાજુક દિલ જે 
પાષાણને મનાવવા ગયું 
પાણી નાખી થોર પર
જે અંબા વાવવા ગયું 
કરી સૌની સેવા ખુશ તે બહુ થયું
ને માંગી બેઠું એ મૂર્ખ નાનીશી સરાહ
મરઘાટોનાં વિશ્વમાં એક નાનો જીવ 
ચૂમે છે સર્પને ઈચ્છે પ્રેમ-પનાહ
છે કેવો મૂર્ખ જે કરે છે એવી ચાહ 

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फिर...

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए