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मुस्कुराकर जब वो मेरा नाम लेते हैं

मुस्कुराकर जब वो मेरा नाम लेते हैं  दोनों हाथोंसे दिल को थाम लेते हैं  फिसलते नहीं अब नखरों पर उनके यूँ तजुर्बे और संयमसे काम लेते हैं  चलो खुद ही चलाते हैं खंजर खुदपर  ज़रा उनके हाथोंको आराम देते हैं  अन्जान हाथोंमें उंगलियां पिरोयीं जिसने  बेवफाई का हमको इल्जाम देते हैं  करते हैं यकीन तो खाते ही हैं धोका  एहतियात हालाँकि तमाम लेते हैं  

राम मुबारक हो तुमको

राम मुबारक हो तुमको  आख़िरकार अपना धाम मिला  कितनी सदियाँ भटके हो  अब जा करके आराम मिला  तुम और तुम्हारे होने पर  कई प्रश्न, अनेको तर्क चले  हर एक अदालतके आगे  सच जैसे तुम निर्भीक मिले  जुठलानेकी खातिर तुमको  भरसक झूठों ने यत्न किये  धर्म, हया, माँ-बाप सभी  बाज़ारोंमें ही त्याग दीये  वर्षों से जलती क्रांतिको  एक सुखद अंजाम मिला  राम मुबारक हो तुमको  आख़िरकार अपना धाम मिला कितने ताने कितने लांछन  तुमपर अबतक हैं उछल रहे  हर दिन एक नयी परीक्षाकी  अग्निसे जलकर निकल रहे  अपने मूल्योंके मानक पर  कलियुगमें तुमको तौल रहे  जाने-अनजाने धोबीकी  वही भाषा हम भी बोल रहे  इन कल्पित दोषोंको सरे  बाजार तुम्हारे जता रहे  तुम तो कहीं और के हो  भारतको ऐसा बता रहे  श्रद्धा को विजय, परिश्रमको  निश्चित ही ये परिणाम मिला  राम मुबारक हो तुमको  आख़िरकार अपना धाम मिला पानी पर पत्थर क्यों तैरे  संशय इसपर भी किये गये 

माजरा क्या है

उसने बड़े दिनों में किया है याद, माजरा क्या है  कोई शिकायत है या फ़रियाद, माजरा क्या है  टूटकर बिखर गया था, अब समेट चूका हूँ खुदको  दिख रहे फिर पत्थर उसके हाथ, माजरा क्या है  दिल भी तोड़ा मेरा, इलज़ाम भी लगाया मुझपर  गज़ब है की आज फिर वही बात, माजरा क्या है  आंसूंओंसे भीगे रुमाल लिए लौटा करता था मैं  वही इश्क़ औ मैं भी, वही हालात, माजरा क्या है  पहले चूमि हथेली फिर आंसू गिराए, भींच दिया   मुट्ठीमें समा जाएँ इतने जज़्बात, माजरा क्या है 

इस कहानी का कोई अंजाम उनसे पूछना

इस कहानी का कोई अंजाम उनसे पूछना  ना पूछना मेरी खबर ना नाम उनसे पूछना  जो चुप रहें वो भेद मनका जान ही तो जाओगे  फिर हैं कैसे दिन क्यों कैसी शाम उनसे पूछना काले रंग की डायरीमें अब तलक छुपाये हैं  किस दीवानेने लिक्खे पयाम उनसे पूछना  शेर जिसके गुनगुनाते रेहते हो दिनरात तुम  दोगे उस कविको क्या इनाम उनसे पूछना  वक़्त सारा खो दिया, इक इश्क़की तलाशमे  कैसा नाकारा हूँ क्यों बदनाम उनसे पूछना  आया नहीं बाज़ारमें हमें बेचना अपना हुनर  राज क्यूँकर रेह गया गुमनाम उनसे पूछना 

मिलते ही निगाहें उसके तेवर पहचानते हैं

मिलते ही निगाहें उसके तेवर पहचानते हैं  समंदरके मुसाफिर हैं हम, भंवर जानते हैं  हमसे मिलो जब भी खुदको संभाले रखना इश्क़ करते हैं औ निभानेका हुनर जानते हैं  एक मुस्कानने बता दी ग़मकी सारी कहानी  बोहत तजुर्बे हैं, टूटे दिलका असर जानते हैं  होली-दीवाली मिलने आ जाते हैं दोस्त सभी  याद बोहत आता है शायद मुझे घर जानते हैं  तूफ़ानोंका खौफ तो कबसे जाता रहा राज भीगे पंख लिए उडनेका हम जोहर जानते हैं  

ईशारों ही ईशारोंमें सब बात होती

ईशारों ही ईशारोंमें सब बात होती  सफरमें जब उससे मुलाकात होती  अजनबी ज्यों वाकिफ़ हैं, काश वैसे  उसे भी कुछ हमारी मालूमात होती  दुआ क़ुबूल हो गर तो तेरे बिना मेरा   ना ही कोई दिन होता, ना रात होती  ज़ुल्फ़ बिखेरे हुये मुझसे मिलने आते  इससे बढ़कर और क्या सौगात होती  छींटे उड़ाने वाले, नज़रें मिलाएं कभी  मेरे दुश्मनकी इतनी तो औकात होती  ख़ामोशी से ऊब गया हूँ, ये सोचता हूँ  बेहल जाता मन जो कोई वारदात होती  अच्छा होता की बैर ही पाल लेते दोस्त इस झूठे तकल्लुफ़से तो निजात होती  किसे जाना है स्वर्ग, मोक्ष किसे चाहिए  खुश होते जो तेरे पेहलुमें वफ़ात होती  इश्क़ लिखते, प्यार पढ़ते, गाते चाहत  कुछ ना होता मगर इतनी हयात होती 

ऐसा क्या है जो ये हो नहीं सकता

ऐसा क्या है जो ये हो नहीं सकता  हूँ इंसान मैं भी, क्यों रो नहीं सकता  तेरा ग़म है तुझसे ज़्यादा अज़ीज़  तुझे खो दिया, इसे खो नहीं सकता  कुशल तैराक हूँ, येही सोच कूदे थे ना  क्या लगा, इश्क़, मुझे डुबो नहीं सकता आँखोंके दरियामें उसके सयाने हुए गुम  मैं तो फिर दीवाना, क्यूँ खो नहीं सकता  बेवफा केह दिया ज़रासी नाराजगीमें मुझे  रूह पे लगाया है दाग, ये धो नहीं सकता  जवाब उनके भी हैं, सवाल जो पूछे ही नहीं  दिल पर इतना बोझ, अब ढो नहीं सकता  मेरा हो ना हो, खुश वो सदा रहे, दुआ मेरी  यदि भाव ये ना हों तो वो प्रेम हो नहीं सकता