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कुछ कवितायेँ, कुछ शेर, कुछ नग्मोंकी थाती है

कुछ कवितायेँ, कुछ शेर, कुछ नग्मोंकी थाती है 
दिलसे निकलकर कुछ बातें, गीतोंमें आती हैं 

हमने कब मन्ज़िलको सोचकर किया सफर शुरू 
चल पड़े जिस भी डगर, तुम तक ले आती है 

इंसानियत है की खैरात भी एहतिरामसे दी जाये
ज़रूरतें घुटनों पर बड़े बडोंको ले आती है 

गुब्बारे मिलते ही खिलखिलाने लगे बच्चे फिर
सस्तमे इतनी कीमती नेमत मिल जाती है

दीवाली मिलने आये बेटे-बहू, पोते-पोतीके लीये 
दुखते घुटने लिए माँ रसोइमे जुट जाती है

उसकी गलीसे आज भी गुज़रता हूँ मैं जब 
कनखियोंसे देखती है और मुस्कराती है

सुबहसे शाम तक खड़े खड़े कमर दुखती तो है 
रातको फिर भी साजनके वो पैर दबाती है 

बोहत लड़ झगड़कर घरसे निकला था मैं कल 
कलसे ही घरकी बोहत याद मुझे आती है

बालूशाही खिलानेवालेके वहां स्वागतमे पानी-गुड़ 
तक़दीर कभी ऐसा भी वक़्त दिखाती है 

हसीं नज़ारों से है आबाद ये दुनिया तेरी मालिक 
उस चेहरे से कभी निगाह हटे तो नज़ारा मैं करूँ

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फिर...

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए