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तरसते रहे

इक मुलाकात को हर दिन तरसते रहे 
बूंदें न गिरी हम पर बादल बरसते रहे 
नज़रें दर्पण बनी बैठी थी इंतज़ार में 
वो आईने को देख सजते संवरते रहे 

लोगों ने कहा सब आँखों का छलावा है 
मोहब्बत होगी तुमको उनका दिखावा है 
वो पथरीले किनारे हम समंदर की लहरें 
टकराकर उनसे दिल टूटते बिखरते रहे 

पास आकर भी पास आये नहीं 
दर्द थे बहुत हमने जताये नहीं 
तकलीफसे उनके हाथोंको बचाने को 
खुद ही खोद कब्र खुद ही उतरते रहे 

भूल जाने का फैसला फिर किया हमने  
जा आखरी अलविदा कर दिया हमने 
ज़िक्र अब तेरा क़यामत के रोज़ होगा 
रोज़ भले गलियोंसे तेरी होकर गुज़रते रहे

चालाकी उनकी उन्हीको महंगी पड़ी 
सादगी से हम तो ज़हर भी पीते रहे 
रोने से कहाँ लौटेंगे लम्हें जो बीत गए 
था वक़्त कभी तेरी यादों में जीते रहे 

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फिर...

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए