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और प्यार में क्या पाया

जीवनकी हर मुश्किलका हल, मेरी कवितायेँ और ग़ज़ल
पा जाता हूँ जब सुनता हूँ, तेरे कंगन तेरी पायल
दर्पणमें देखूं छब तेरी, मैं खुदका नक्श भुला आया
एक ग़म, कुछ आंसू, टूटा दिल, बस और प्यारमें क्या पाया

चोटीमें गुंथी हुई कलियोंकी मेहक अभी तक याद रही
लाली होठोंकी मेरे लबों पर बरसोंके भी बाद रही 
काजल आँखोंका मेघ घटाओंसा घिरकर मनपर आया
तिरकरभी डूब गए यादोंमें, तब जाके कहीं सुकून आया 

जिस शहर, गली, बाज़ारोंमें तेरे क़दमों की आहट हों 
मेरे तो चारोंधाम वहीँ काशी, मथुरा, गंगा-तट हों
तेरे होठों ने छुआ जिन्हें हर शब्द गीत बनकर आया 
तुझपे ही लिखा जो लीखा अगर, तुझको ही गाया जो गाया 

छुप छुप के मिलना और मिलनके बाद जुदाई का आलम 
दो पल खुशियों के बीच तेरी यादें तेरे जानेका ग़म 
मुड़के खोज रही आँखोंने पता मेरा जैसे पाया 
झुकती पलकें मुस्काई ऐसे नाम मेरा लब पे आया 

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