Skip to main content

Posts

नज़ारा होते ही शबाबका उछल जाता हूँ

नज़ारा होते ही शबाबका उछल जाता हूँ  दिल हूँ मैं, आदतन फिसल जाता हूँ  छोटे-बड़े, आड़े-तिरछे, जो मिले खेल लूँ  हूँ बच्चे सा, गुब्बारोंसे बेहल जाता हूँ  मंज़िलोंसे अधिक प्रेम सफर से है मुझको  कहाँ को चलता हूँ, कहाँ निकल जाता हूँ 

चीर कर यूँ दिल अपना दिखाते हैं

चीर कर यूँ दिल अपना दिखाते हैं  आइये इक नया नगमा सुनाते हैं  हँस दीजिये भले ही देख ज़ख्म मेरे  ये दुःख किसीके तो काम आते हैं  दाद नहीं दोगे, शायद पढ़ो भी नहीं  हम शेरोंमें जीते हैं रोज़ मरे जाते हैं 

तेरे ग़म, तेरी खुशियां, सभी मुश्किलें बांटूंगा

तेरे ग़म, तेरी खुशियां, सभी मुश्किलें बांटूंगा  पाँव दबा दूंगा लेकिन तेरे तलवे नहीं चाटूँगा  इश्क़, मोहब्बत, दीवानगी, कम नहीं फिर भी  बिछड़ जाने पर कभी कलाइयां नहीं काटूंगा  तू है ज़रूरी सब से मगर बस तू ज़िन्दगी नहीं  कभी कभी कुछ वक़्त मैं तन्हाईमें भी काटूंगा

मेरी ही बदौलत हैं

सब गीत, किस्से, कहानियाँ, मेरी ही बदौलत हैं  तुम्हारी जितनी हैं परेशानियाँ मेरी ही बदौलत हैं कई सैलाब, कई असबाब छुपाये बैठा हूँ खुदमे  कहीं वादियां, कहीं वीरानियाँ मेरी ही बदौलत हैं गुलाबी गालोंकी लाली, नशीली आँखका काजल ये हसीं जितनी भी हैं रानाइयाँ मेरी ही बदौलत हैं  कांपते होंठ, बिखरती ज़ुल्फ़, ये खोये हुए से नैन  मोहब्बतकी सभी निशानियाँ मेरी ही बदौलत हैं  छेड़-छाड़, अठखेलियां, फिर रूठना-मनाना कभी  करते हो जो तुम ये शैतानियाँ, मेरी ही बदौलत हैं  ये जो लिख लेते हो इश्क़ कभी गा लेते हो प्यार  इसे हुनर कहो या हैरानियाँ, मेरी ही बदौलत हैँ 

गर है मोहब्बत तुझे तो यूँ जताया कर

गर है मोहब्बत तुझे तो यूँ जताया कर  नाराज़ भी हो तो जाके लिपट जाया कर यूँ तन्हाईमें अब नींद अच्छी नहीं आती  ख्वाबोंमें आकर मेरे रोज़ जगाया कर  तेरे हर मिज़ाज़ पर हक़ बनाना चाहता हूँ अपना रंजो-ग़म बस मुझे सुनाया कर  लापरवाह, बदगुमान, क्रोधी, ज़िद्दी वगैरा  अपने दीवानेके सब ऐब भूल जाया कर  हर लम्स तेरी चाहतकी गवाही है मुझको  शबो-रोज़ मुझे ये याद दिलाया कर 

मुस्कुराकर जब वो मेरा नाम लेते हैं

मुस्कुराकर जब वो मेरा नाम लेते हैं  दोनों हाथोंसे दिल को थाम लेते हैं  फिसलते नहीं अब नखरों पर उनके यूँ तजुर्बे और संयमसे काम लेते हैं  चलो खुद ही चलाते हैं खंजर खुदपर  ज़रा उनके हाथोंको आराम देते हैं  अन्जान हाथोंमें उंगलियां पिरोयीं जिसने  बेवफाई का हमको इल्जाम देते हैं  करते हैं यकीन तो खाते ही हैं धोका  एहतियात हालाँकि तमाम लेते हैं  

राम मुबारक हो तुमको

राम मुबारक हो तुमको  आख़िरकार अपना धाम मिला  कितनी सदियाँ भटके हो  अब जा करके आराम मिला  तुम और तुम्हारे होने पर  कई प्रश्न, अनेको तर्क चले  हर एक अदालतके आगे  सच जैसे तुम निर्भीक मिले  जुठलानेकी खातिर तुमको  भरसक झूठों ने यत्न किये  धर्म, हया, माँ-बाप सभी  बाज़ारोंमें ही त्याग दीये  वर्षों से जलती क्रांतिको  एक सुखद अंजाम मिला  राम मुबारक हो तुमको  आख़िरकार अपना धाम मिला कितने ताने कितने लांछन  तुमपर अबतक हैं उछल रहे  हर दिन एक नयी परीक्षाकी  अग्निसे जलकर निकल रहे  अपने मूल्योंके मानक पर  कलियुगमें तुमको तौल रहे  जाने-अनजाने धोबीकी  वही भाषा हम भी बोल रहे  इन कल्पित दोषोंको सरे  बाजार तुम्हारे जता रहे  तुम तो कहीं और के हो  भारतको ऐसा बता रहे  श्रद्धा को विजय, परिश्रमको  निश्चित ही ये परिणाम मिला  राम मुबारक हो तुमको  आख़िरकार अपना धाम मिला पानी पर पत्थर क्यों तैरे  संशय इसपर भी किये गये