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नज़ारा होते ही शबाबका उछल जाता हूँ

नज़ारा होते ही शबाबका उछल जाता हूँ 
दिल हूँ मैं, आदतन फिसल जाता हूँ 

छोटे-बड़े, आड़े-तिरछे, जो मिले खेल लूँ 
हूँ बच्चे सा, गुब्बारोंसे बेहल जाता हूँ 

मंज़िलोंसे अधिक प्रेम सफर से है मुझको 
कहाँ को चलता हूँ, कहाँ निकल जाता हूँ 

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