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हालात से जंग

अंधेरोंने घेरा जहाँको है ऐसे किरन एक उम्मीदकी ना नज़र है मुझे फिर भी अपनी खुदी का यक़ीं  सूरजको तूफानोंमें ढूंढ लूँगा  है मुमकिनकी हालात ही जीत जाएँ मेरा हर इरादा नाकाम हो भी शोले भले ही बुझ जाएँ आँधियोंमें दीपक मगर मैं जला के रखूँगा नज़दीकियां ही हों दुश्मन जो अपनी मनको तो मत दूर होने ही दीजे हाथों से हाथों का ना मेल हो पर दिलसे गले लगा तो मैं लूँगा हो गए हम तो क़ैदी अपने ही घरमें और घर ही के लोगों से पर्दा हुआ है है देहलीज पर आफतों का बसेरा किवाड़ोंको मेहफ़ूज़ करता रहूँगा है मुझपर ये नेमत की अपनी ही छतके नीचे हूँ नहीं मोहताज़ फिर भी बिलखती भूखोंकी सुनकर सदाएँ उन्हें सहारे की आवाज़ दूँगा जो अपने दर की तलाशों में तन्हा शहरों से गावों को पैदल चले हैं उन अनजान चेहरोंमें मुझसे हों मिलते सारे वो चेहरे पहचान लूँगा रोटी को बांटने निकले जो बाहर उनसे कहूंगा की इज़्ज़त भी बांटे नज़रें झुकें ना हाथ फैले खैरात भी उन लिहाजों से दूँगा आकाओंसे क्या उम्मीद करना कुर्सी ही जिनका है दीनो-इमां  है उसका भरोसा ये जंग भी मैं  उसीके भरोसे पर जीत लूँगा 

ઝાન્ઝવા પાછળની દોટ

લાગણીઓનાં દુકાળમાં પીડાતું હૃદય  બની ગયું છે એકલું, ને  શોધી રહ્યું છે આજ, કે  કાશ આવો તમે, ને લઇ જાઓ દૂર ઘણે  દૂર અંતરિક્ષની પાર, જ્યાં ના રહે કોઈ અવકાશ  કે કોઈ છીનવી શકે મુજ આકાશ  ને વિહરીએ આ મુક્ત ગગનમાં પંખી બની  ભયના હોય કે ના હોય કોઈ લાલચ જ્યાં  કે જીવતી સંવેદનાઓનું ના હોય કોઈ મરઘટ ત્યાં  આવો, આવો ને મીત મારા કે પ્રીતના હો ભણકારાં  ને ઉન્મત્ત બનીને ફરતા સુરજનેય કરવી પડે આંખોં બંદ, ફેલાવો તમારા પ્રેમનો એવો ચળકાટ છે ઘણી જે સાલતી તમારી મુજને ખોટ  પુરી દો, પુરી દો ને આવી વરસો બની વાદળી  ભીંજવો મુજ અસ્તિત્વને છીપાવો દો તૃષા  રોકી દો, રોકી દો મારી ઝાન્ઝવા પાછળની દોટ 

આવીને જો

શબ્દોની રમતજાળથી પર આવીને જો  બની શકે તો સંસારથી પર આવીને જો  ગણ્યા ગણાય ના તેટલા પત્રો લખયાં મેં તુજને  રહી ગયી છે તેમની છાપ જે અફર આવીને જો  કરવા છતાંય પ્રયત્ન બાંધ હૃદય પર બંધાતો નથી  આંસુઓથી છે પલાળ્યા તે રૂમાલ આવીને જો  છે કર્યો બનતો ઉપયોગ રક્તનો, શાહીને સ્થાને  બચી ગયેલ મુજ શ્વેત કંકાલ આવીને જો 

ऐ दोस्त, कुछ याद है?

ऐ दोस्त, कुछ याद है? साथ बीते पल, कुछ याद है? पुरानी तस्वीरोंसे कभी-कभी है झांकता गुज़रा हुआ कल, कुछ याद है? कंचों की छीना झपटी  और बेंत की बढ़ती लम्बाई जीत-हार का लेन-देन और रोज़ की लड़ाई हिसाब में जमा कंचे कितने  कितनी उधारी, कुछ याद है? भाड़ेकी साईकिलके हिस्से चार मिनटों मिनटों की अलग रफ़्तार  आज तेरी कल मेरी मम्मीसे  रुपये का तकाजा बिनती बारबार अंकल जो हमको फ्रीमें ही देते खट्टी-मीठी टॉफ़ी, कुछ याद है? स्कूलके बक्से में लट्टू लेजाना विद्याके पत्तोंको किताबों में सजाना फ्री किलासमें अंताक्षरी गाते बेंचपर तबला और ढोलक बजाना मुर्गा बनाकर पीठपर जो रखते स्केल कितनी गिरायी, कुछ याद है? बचपन बीता, आयी जवानी  नया सर्ग, पुरानी कहानी  नए यार, दौर था नया  तुमहुम कुछ बदले, कुछ ज़िंदगानी  कितनी दोस्ती नयी बनी थी  कितनी खों दीं, कुछ याद है?  पेहली मोहब्बत में दीवाना होना साथ लगाए जिस गली के चक्कर इज़हार का डर, बांटा था कैसे  गम इंकार का भी झेला था अक्सर  चिट्ठियां कितनी किसको मिली थी कितनी लिखी थी, कुछ याद है? दिल का टूटना आँखोंका बहना  कभी ...

મૃગજળ પાછળની દોટ

દોડી રહ્યો છું ક્ષિતિજમાં ભાસતા એક છળની પાછળ  છે જ્યાં સહેરાઓની મેહફીલ એવા એક મૃગજળની પાછળ છે મને તરસ શાની એથી હું અંજાન નથી  છળથી લૂંટી જાય કોઈ એટલોયે બેભાન નથી  પણ રાખવા એહસાસ કે જીવંત છું હજી ચાલ્યો જાઉં છું રાખી નાહક ઉમ્મીદ ને આગળ  કરશે જરૂર અંત મારો સાલતી જે તમારી ખોટ કે ના છોડીશ હું કદી મૃગજળનાં પાછળની દોટ શક્ય બને ને કદાચ મારી યાદ રૂપી કબ્રને  ભીંજવે તમારાં નયનોના જળ નિર્મળ છે જ્યાં સહેરાની મેહફીલ એવા કોઈ મૃગજળની પાછળ દોડી રહ્યો છું ક્ષિતિજમાં ભાસતા એક છળની પાછળ 

खुशबुने कहा

हवामें उड़ती हुई एक खुशबु  कुछ कह गयी मुझे, अफसाना सुनाया न कोई, न बात की कोई, फिरभी छेड़कर दिलके तार संगीत सुनाया कोई भर गई है साँसोंमें या रूहमें समां गयी वो  ज़मीं पर हो आसमां वैसे छा गयी वो थी न कोई ज़रूरत  न अरमां उसका  पर यूँ लगा की बना है सारा जहाँ उसका हर शय में वो नज़र आती है हर साँसमें वो गाती है, की आओ मेरे प्रिय और  ले जाओ अपने संग दूर सबसे दूर जहां  हो जहाँ का अंत रहें वहां सिर्फ मैं और तुम  सारे रिश्ते, सारी तमन्नाएँ  हो जाएँ जहां गुम तुम बनो धड़कन मेरी  मैं सांस हूँ तुम्हारी सुनने की उसकी बातें  चाह रह गयी मुझे  हवामें उड़ती हुई खुशबु  यही कह गयी मुझे 

पथ्थरोंकी भीड़

पत्थरोंकी भीडमें फंसा आदमी जो चाहकरभी निकल पाता नहीं घिरा है कश्मकशमें ऐसी की हर सांस उसकी मुश्किल हुई आह उसकी सुनके कोई सदा देता नहीं छोड़ा है उसे सबने जैसे बेजान पत्थर कोई काश! काश कोई जाए और समझाए उसे ज़्हिंदगीके मायने सही, कोई बतलाये उसे डर है वर्ना, वो बच नहीं पायेगा घुट घुट कर बहुत, वहीँ मर जायेगा जाओ सम्भालो उस पागल दीवाने को छोड़कर चला है वो सारे ज़माने को की फ़र्ज़ है जिसका बाँटना ज़िन्दगी वो इस हालमें खुद को जिला पाता नहीं चला बदलने ज़मानेको पर खुद ही संभल पाता नहीं पथ्थरोंकी भीड़में फंसा आदमी   जो चाहकरभी निकल पाता नहीं