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Wo

नज़र लगने के डरसे मुंह अपना छुपाते रहे वो 
दिल के अरमान बुझाते कभी जलाते रहे वो 
कोई बैठा रहा रात सारी निगाहें छत पर लगाए हुए 
परदे के पीछे ही शरारत से मुस्काते रहे वो 

नज़र के तीर, अदाओं की बरछियाँ तो तेज थीं 
गिराईं हुस्नकी मुझ पर वो बिजलियाँ तो तेज थीं 
क़त्ल होने को तैयार ही बैठे हुए थे हम 
क्या सितम की हमें हर दफै बचाते रहे वो 

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मुलाक़ात होती नहीं

उससे ख़ूबसूरत कोई बात होती नहीं, कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं दिन आता-जाता है, शोरोगुल के साथ नब्ज़ दोहराती है तुझे हर धड़कन के बाद मुश्किल है गुज़र यह रात होती नहीं कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं यादों ने बसा रक्खा है घरोंदा सा दिल में सोचते हैं तुझको तन्हाई में, महफ़िल में फिर भी अक्सर तू मेरे साथ होती नहीं कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं झलकते हैं नग्मों में फ़सानों में महकते हैं  बसते हैं ख्यालों में ख्वाबों ही में मिलते हैं इतनी नज़दीकी में भी पास वो होती नहीं  कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं बैठे हैं आज फिर करने को यह फ़रियाद क्या आओगे मिलने, मेरे मरने के बाद? हद है अब के जुदाई, बर्दाश्त यह होती नहीं कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं

Koshish...

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