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आइना

मेरी अपनी तस्वीरको भी पलट करके दिखाता है  झूठ कहा किसीने की आइना सब सच बताता है  मैं जैसा सोचूं मनमें ठीक वैसा ही देख लूँ खुदको  मेरे भरमके मुताबिक़ ही प्रतिबिंब बदल जाता है  उसकी एक मुस्कानने गायब कर दीं शिकन सारी  ज़रा सा मिजाज़ बदलते ही नए रंगमें ढल जाता है  कभी फुर्सत मिलती है तो उसको सँवरते देखता हूँ  ठहरता नहीं है कम्बख्त वहीँ, वक़्त निकल जाता है  दर्पणके सामने ही मेरे पास आ वो भी खड़े हो गये  देखता हूँ की ये मेरा अक्स भी उन पर मर जाता है  

वो केश अब संवारती नहीं

वो केश अब संवारती नहीं  बाँध लेती है जुड़ेमें जोरसे  पेहलेसी घटाएँ पसारती नहीं  वो केश अब संवारती नहीं  समय कम रहता है बोहत  उसके पास सजनेके लीये  वक़्त कभी बचता ही नहीं  किसी हसीन सपनेके लीये  बाहें बालमके गले उतारती नहीं  वो केश अब संवारती नहीं  तैयारी बच्चोंके स्कूल जानेकी  जूते चमकाने, टिफिन बनानेकी   घरके सब काम करनेके बाद  खाना खिलाने, होमवर्क करानेकी  ज़िम्मेदारी तो कोई नकारती नहीं  बस, वो केश अब संवारती नहीं  गीले बालोंसे ओस की बूंदें गिरा  कभी मुझको उठाया करती थी  या बिखरी काली ज़ुल्फ़ों तले  कभी मुझको सुलाया करती थी  सितम ऐसे कोई मुझपर गुजारती नहीं   वो केश अब संवारती नहीं 

छोड़ आया हूँ

लबों तक आ पहुंचा था वो समंदर छोड़ आया हूँ  दीवानगी प्यासकी थी ऐसी मैं सागर छोड़ आया हूँ  एक पेड़ने बरसों बचाये रक्खा था धूपसे मुझको  एक तलाशमे निकला हूँ, वो शजर छोड़ आया हूँ 

मेरी किताबें

मेरे शौख, मेरे ऐब, मेरी लत हैं ये  छुड़ाए नहीं छूटती वो आदत हैं ये  बड़ी जागीर कोई नहीं जुटाई मैंने  संजोई जीवनभर वो दौलत हैं ये  चाहते हो ढूंढना खुदको अगर तुम  पेहली और आखिरी ज़रूरत हैं ये  कई रंगके किरदार जीये मैंने इनमे  कभी हवस हैं कभी इबादत हैं ये  चंद पन्नोंमे संसार छुपाये रेहती हैं  मेरी सबसे अज़ीज़ विरासत हैं ये 

रहे हैं

दास्तान अपनी इन्हीं गीतोंमें गा रहे हैं  लिखे थे तुम्हारे लिए, जगको सुना रहे हैं  ग़ज़लका मोज़ू, शायरी की तम्हीद हो तुम  तुम्हारा है दर्द जो शायरी में लिखे जा रहे हैं ऐसा नहीं की मिलनेको बेकरारी है कम  तुम्हारे लिए ही रंग बालोंमे लगा रहे हैं  शाख़ पर अकेला जिन्हें छोड़ गए परिंदे  घोंसले अब वो मेरे सपनों में आ रहे हैं  किसी दिन तो गुमनामीके अँधेरे छंटेंगे  रोज़ाना नया कलाम लिखे जा रहे हैं  ये जो जब्त किये बैठे हो सारी रौशनी ख़बरदार की मंच पर अब हम आ रहे हैं  सुख़नवर हो तुम, भरम छोड़ दो राज  ये देखो फिर वो बिना पढ़े जा रहे हैं 

है मुझे

शायरी से है प्रेम, कवितासे मोहब्बत है मुझे  कुरेदना दिलके ज़ख्म रोज़, आदत है मुझे  अब कोई यार पेहले सा अज़ीज़ नहीं रहा  अपने लिए बोहत आजकल फुर्सत है मुझे  उसकी हर तस्वीरको बार बार देखता हूँ   ये क्या गज़ब नशा, अजीब लत है मुझे  दौलतें गिरीं पैरों पर, झुक कर उठा ना सके  इसी उसूलपरस्तीसे अब नफरत है मुझे   फिलवक्त अर्ज़ियाँ नामंज़ूर कर रहा लेकिन  सुन सब रहा है मेरा राम, अक़ीदत है मुझे 

तुम्हीं थे

मुंह मोड़ कर जानेवाले देखा मैंने, तुम्हीं थे  देख रहे थे बड़ी देरसे इधर देखा मैंने, तुम्हीं थे  घरकी दीवारमे चुनवा दिए, मुझपर चले जो कल  मुसलसल पत्थर चलानेवाले देखा मैंने, तुम्हीं थे