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आशा

पिछले वर्ष एक पौधा लगाया
सूंदर फूल आएंगे ये सोच 
कुछ ईश्वर को भेंट होंगे, 
कुछ पत्नी, बच्चों को 
नियमित पानी, खाद डालकर सींचा 
रोज़ रोज़ बढ़ते देखते उसे 

बसन्तमें रंग बदलने लगे 
कलियों का निकलना, 
फूलों का खिलना, जैसे 
सारी उम्मीदें पूरी हो रही हों 

अचानक एक तूफ़ान मुड़ा 
समंदर से ज़मीन की और 
बोहत देर तक पौधा जूझा 
डंडियों और रस्सियोंका सहारा दिया 
लेकिन 
जड़ों से मिटटी के हाथ छूट गए 

माली से फिर मंगवाया 
उसी नस्ल का नया पौधा 
नयी आशाओं से फिर लगाया 
फिर सींचूंगा, खाद दूंगा 
अगली बसंत के इंतज़ार में 
आशा ये भी की अब की 
आनेवाले तूफ़ानोंमें 
अपने अपनों के हाथ ना छोड़ें 

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए