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बहती नदिया

मेरे शहरमें वैसे तो कोई खास बात नहीं  कुछ बड़ी इमारतें हैं, बाकी शहरों जैसी ही  कई रास्ते हैं और उन पर चलते दौड़ते लोग  वही ग़म हैं और ख़ुशी, बाकी शहरों जैसे ही  अलग हैं तो बस तुम, इस बहती नदिया सी  और किनारे बैठ तुमको लिखता हुआ मैं 

रेहने दे

बोहत कुछ है केहने को मगर, खामोश रेहने दे  बात मान मेरे यार, ज़िद ना कर, खामोश रेहने दे  कल फिर उन्हें देख तमन्नाएँ गीत गाने लगीं  छेड़ ना दिल के तार यूँ, खामोश रेहने दे 

प्रतीक्षा

मेरी प्रतीक्षा को प्रतिफल दिलाये कोई  उसके घरका पता मुझे भी बताये कोई  कविताके ये फूल उन्हीं पर बरसाने हैं  किस गली है आना जाना, दिखाये कोई 

अजनबी

तेरी हर तस्वीर, हर रील को दसियों बार देख लिया  सब में वही खुले बाल, बड़ी बड़ी काजल लगी आँखें  और मुस्कुराता हुआ मासूम सा चेहरा  कुछ अनोखा नहीं है तुझमे, ना नाच ना ललचाती अदाएं  इंस्टाग्राम पर सैंकड़ों डोलती, लुभाती सुंदरियाँ दिखती हैं  मगर, ए अजनबी क्यूँ बार बार लौटता हूँ  तेरी प्रोफाइल पर  तेरी अवाजमे कहे हर शेरनी छू लिया दिलको मेरे  जलन होती है मुझे आईनेसे  जिसके सामने तुम बैठती हो  शायद, मुझे इश्क़ हो गया है तेरी शायरी से,  तेरी सादगी से, और तुझसे   क्या संभव है किसीसे बिना मिले प्रेम करना?  क्या ये इंतज़ार, ये तड़प, उसी प्रेम के लक्षण हैं?  बताना मुझे ए अजनबी, गर जान पाओ तो  क्यूंकि अब मेरे दिल ओ दिमाग पर तुम्हारे शब्द  तुम्हारा चेहरा छाया हुआ है हर समय  कोई नया शेर सूझता ही नहीं जो तेरे लिए ना हो  मेरी शायरी तुझमे समां गयी है शायद  तो इतनी बिनती मान लो,  मेरे हिस्सेके शेर भी तुम्हीं कह दो 

सावनकी दोपहर

अलसाई दोपहरोंमें सावनके बादलों को देख  एक कविता मनमें आकार लेने लगती है  जैसे हवाएं काले मेघ उड़ाकर मेरी छत पर ले आयीं  वैसे ही ये काव्य एक नाम लाकर जिह्वा पर छोड़ गया  नयन उठाये, हृदयमे आशा भरे, आकाश निहार रहा हूँ  लेखनी कागज़ पर टिकाये वैसे ही प्रतीक्षा में हूँ की  अब फटेंगे बादल भावनाओंके, अब बरसेंगे अभ्र अब ख़याल आकार लेंगे, अब शब्द बनेंगे शायरी  और प्यासी धरा तृप्त होगी बरखा के आने पर जैसे  मेरे उर में भी वैसा ही हर्ष व्याप्त होगा काव्य बन जानेपर  यकायक पवन तेज़ चल पड़े, बादल बिखर गए  अचला फिर इन्तेज़ारमे रह गयी, वर्षा नहीं आयी  कदाचित ये नज़्म भी अधूरी रेह जाएगी आज  और वो नाम जबान पर ठेहरेगा नहीं, दिलमे लौट जायेगा 

आइना

मेरी अपनी तस्वीरको भी पलट करके दिखाता है  झूठ कहा किसीने की आइना सब सच बताता है  मैं जैसा सोचूं मनमें ठीक वैसा ही देख लूँ खुदको  मेरे भरमके मुताबिक़ ही प्रतिबिंब बदल जाता है  उसकी एक मुस्कानने गायब कर दीं शिकन सारी  ज़रा सा मिजाज़ बदलते ही नए रंगमें ढल जाता है  कभी फुर्सत मिलती है तो उसको सँवरते देखता हूँ  ठहरता नहीं है कम्बख्त वहीँ, वक़्त निकल जाता है  दर्पणके सामने ही मेरे पास आ वो भी खड़े हो गये  देखता हूँ की ये मेरा अक्स भी उन पर मर जाता है  

वो केश अब संवारती नहीं

वो केश अब संवारती नहीं  बाँध लेती है जुड़ेमें जोरसे  पेहलेसी घटाएँ पसारती नहीं  वो केश अब संवारती नहीं  समय कम रहता है बोहत  उसके पास सजनेके लीये  वक़्त कभी बचता ही नहीं  किसी हसीन सपनेके लीये  बाहें बालमके गले उतारती नहीं  वो केश अब संवारती नहीं  तैयारी बच्चोंके स्कूल जानेकी  जूते चमकाने, टिफिन बनानेकी   घरके सब काम करनेके बाद  खाना खिलाने, होमवर्क करानेकी  ज़िम्मेदारी तो कोई नकारती नहीं  बस, वो केश अब संवारती नहीं  गीले बालोंसे ओस की बूंदें गिरा  कभी मुझको उठाया करती थी  या बिखरी काली ज़ुल्फ़ों तले  कभी मुझको सुलाया करती थी  सितम ऐसे कोई मुझपर गुजारती नहीं   वो केश अब संवारती नहीं