Skip to main content

अजनबी

तेरी हर तस्वीर, हर रील को दसियों बार देख लिया 
सब में वही खुले बाल, बड़ी बड़ी काजल लगी आँखें 
और मुस्कुराता हुआ मासूम सा चेहरा 
कुछ अनोखा नहीं है तुझमे, ना नाच ना ललचाती अदाएं 
इंस्टाग्राम पर सैंकड़ों डोलती, लुभाती सुंदरियाँ दिखती हैं 
मगर, ए अजनबी क्यूँ बार बार लौटता हूँ 
तेरी प्रोफाइल पर 
तेरी अवाजमे कहे हर शेरनी छू लिया दिलको मेरे 
जलन होती है मुझे आईनेसे 
जिसके सामने तुम बैठती हो 
शायद, मुझे इश्क़ हो गया है तेरी शायरी से, 
तेरी सादगी से, और तुझसे  
क्या संभव है किसीसे बिना मिले प्रेम करना? 
क्या ये इंतज़ार, ये तड़प, उसी प्रेम के लक्षण हैं? 
बताना मुझे ए अजनबी, गर जान पाओ तो 
क्यूंकि अब मेरे दिल ओ दिमाग पर तुम्हारे शब्द 
तुम्हारा चेहरा छाया हुआ है हर समय 
कोई नया शेर सूझता ही नहीं जो तेरे लिए ना हो 
मेरी शायरी तुझमे समां गयी है शायद 
तो इतनी बिनती मान लो, 
मेरे हिस्सेके शेर भी तुम्हीं कह दो 

Comments

Popular posts from this blog

फिर...

फिर किसी बातपे दिल भर आया है अभी  जैसे भुलासा कोई दर्द उभर आया है अभी  फिर अधूरा छूट गया किस्सा जो पसंद था  ज़ेहनमे क्यों तेरा ख़याल उतर आया है अभी  फिर ज़रा सी बात पर बात बंद हो चली है  नये कपडोंमे नया फोटो नज़र आया है अभी फिर एक अजनबी सफरमें मुस्कुराता मिला  जान पड़ताकी नया इस शहर आया है अभी फिर खूबसूरत उदास ऑंखें इन्तेज़ारमे थीं  झूठे वादे पर किसने ऐतबार दिलाया है अभी

Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए