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सावनकी दोपहर

अलसाई दोपहरोंमें सावनके बादलों को देख 
एक कविता मनमें आकार लेने लगती है 
जैसे हवाएं काले मेघ उड़ाकर मेरी छत पर ले आयीं 
वैसे ही ये काव्य एक नाम लाकर जिह्वा पर छोड़ गया 
नयन उठाये, हृदयमे आशा भरे, आकाश निहार रहा हूँ 
लेखनी कागज़ पर टिकाये वैसे ही प्रतीक्षा में हूँ की 
अब फटेंगे बादल भावनाओंके, अब बरसेंगे अभ्र
अब ख़याल आकार लेंगे, अब शब्द बनेंगे शायरी 
और प्यासी धरा तृप्त होगी बरखा के आने पर जैसे 
मेरे उर में भी वैसा ही हर्ष व्याप्त होगा काव्य बन जानेपर 
यकायक पवन तेज़ चल पड़े, बादल बिखर गए 
अचला फिर इन्तेज़ारमे रह गयी, वर्षा नहीं आयी 
कदाचित ये नज़्म भी अधूरी रेह जाएगी आज 
और वो नाम जबान पर ठेहरेगा नहीं, दिलमे लौट जायेगा 

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फिर...

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Month end

उलझे थे जो प्रश्न, सब सुलझ जायेंगे  खोये हुए रास्ते, पथिकों को मिल जायेंगे  जो ना हुआ पुरे महीने, आज ही होगा  अटके थे जो आर्डर, सब निकल जायेंगे  मिल जायेंगे क्लाइंट, चेक साइन होंगे  टार्गेट के गैप यकायक कवर हो जायेंगे  तीस दिन सोये, वो निन्द्रासन से जागेंगे  रेंगने वाले प्राणी, उलटे पैर भागेंगे  कमाल जितने हो सकेंगे, आज कर देंगे आखिरी है तारिख, आज काम भी कर जायेंगे 

एक सोच

जीवन कुछ ऐसा हो जैसे बहता पानी,  उड़ते पंछी या कोई बादल  बिना अवरोध चला जाए  अपनी मस्ती में हर पल  काश की संभव हो हम खुद को छुपा लें  किसी कोने में विश्व के जहां,   ना कोई सम्बन्ध ना साथी,  बस हम हों केवल हो नीरव शांति,  ध्वनि ना हो मनुष्यों की   ना वाहनों का कोलाहल   सिर्फ हो तो हम हों,  तनहा अकेले जीवन जीते हुए   परन्तु ऐसा होगा नहीं हम जानते हैं,   संसारी मन को पहचानते हैं   इसी लिए तो बह रहे हैं प्रवाह में,   एक ऐसे पल की चाह में;   की जब जीवन दस्तक दे द्वार पर,   हम ना हों - कोई भी उत्तर ना हो   और वोह परेशां हो कर लौट जाए