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तेरे ख़यालकी हकीकतको ठुकराए हुए

तेरे ख़यालकी हकीकतको ठुकराए हुए 
टटोलता हूँ ज़ज़्बात खुद से छिपाये हुए 

ये भी तो इक हवस है, तेरे इन्तेज़ार में 
चल पड़े हैं फिर रास्तोंपे, भुलाये हुए 

ये बिखरा-सा जुड़ा खुल ही जाये कहीं 
तकते हैं यूँ उम्मीद को खौफ बताये हुए 

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