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Koshish...

कोशीश कर के देखिये चाहे जो हो हाल
अच्छा - बुरा समय हो फिर भी, मत हो जी बेहाल
बून्द बून्द सागर है भरता, कह गए तुलसीदास
उद्यम हिम्मत परिश्रम से मिटते, जग के सब जंजाल

रास्ते में कांटे देख, मुंह जो नहीं फिराता है
सागर की गहराई से वह, मोती ढूंढ के लाता है
जो नहीं डिगता अपने पथ से, विपदाओं के आने पर
जिसके साहस की लहरें न बिखरें, शिलाओं से टकराने पर
ध्रुव तारे सा अचल रहे जो, अपने लक्ष्य की प्राप्ति को
जय के गौरव का भोग करे, माँ का वोही लाल

Comments

  1. Very nice ..it’s really motivating.. Each words are penned superbly... looking forward more poems ...

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मुलाक़ात होती नहीं

उससे ख़ूबसूरत कोई बात होती नहीं, कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं दिन आता-जाता है, शोरोगुल के साथ नब्ज़ दोहराती है तुझे हर धड़कन के बाद मुश्किल है गुज़र यह रात होती नहीं कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं यादों ने बसा रक्खा है घरोंदा सा दिल में सोचते हैं तुझको तन्हाई में, महफ़िल में फिर भी अक्सर तू मेरे साथ होती नहीं कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं झलकते हैं नग्मों में फ़सानों में महकते हैं  बसते हैं ख्यालों में ख्वाबों ही में मिलते हैं इतनी नज़दीकी में भी पास वो होती नहीं  कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं बैठे हैं आज फिर करने को यह फ़रियाद क्या आओगे मिलने, मेरे मरने के बाद? हद है अब के जुदाई, बर्दाश्त यह होती नहीं कमबख्त मगर रोज़ मुलाक़ात होती नहीं

होली हो अपनी

रंगोंके उमड़ें जब बादल तो होली हो अपनी  छलकें पिचकारीसे सागर तो होली हो अपनी एक बरस पूरा बीता बस इस क्षणकी प्रतीक्षामें  निकलें वो घरसे जब बाहर तो होली हो अपनी अबीर, गुलाल, सिंदूर सभी रंग उतर ये जाएँगे  रंगे हमें आँखोंका काजल तो होली हो अपनी बरसें चारों मेघ मगर फागुन ये अधूरा रेह जाये  जो भीगे प्रियतमका आँचल तो होली हो अपनी लाली खुलती सुब्हा की, श्यामा रात दीवालीसी  खिलें रंग मखमली गालों पर तो होली हो अपनी छेड़-छाड़ औ खींच-तान, इनका है आनंद अलग  यदि बाहोंमे आये खुद चलकर तो होली हो अपनी वर्ण सभी, सारी रौनक, शोभा सब तुमसे जीवनकी  नित देखो हमें यूँ ही मुस्काकर तो होली हो अपनी 

माजरा क्या है

उसने बड़े दिनों में किया है याद, माजरा क्या है  कोई शिकायत है या फ़रियाद, माजरा क्या है  टूटकर बिखर गया था, अब समेट चूका हूँ खुदको  दिख रहे फिर पत्थर उसके हाथ, माजरा क्या है  दिल भी तोड़ा मेरा, इलज़ाम भी लगाया मुझपर  गज़ब है की आज फिर वही बात, माजरा क्या है  आंसूंओंसे भीगे रुमाल लिए लौटा करता था मैं  वही इश्क़ औ मैं भी, वही हालात, माजरा क्या है  पहले चूमि हथेली फिर आंसू गिराए, भींच दिया   मुट्ठीमें समा जाएँ इतने जज़्बात, माजरा क्या है